अनूपपुर-जैतहरी। सरकार कहती है कि अब ऑनलाइन व्यवस्था से आम नागरिक को पारदर्शी, सस्ता और समयबद्ध न्याय मिलेगा। लेकिन यदि ज़मीनी हकीकत कुछ और हो तो क्या इसे सुशासन कहा जाएगा? जैतहरी तहसील में पदस्थ बाबुओं की कार्यशैली पर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। आरोप है कि लोक सेवा गारंटी के माध्यम से आवेदन करने के बाद भी किसानों और आम नागरिकों को निर्धारित समय पर नकल, बंटवारा, नामांतरण, सीमांकन, तरमीम सहित अन्य राजस्व संबंधी कार्यों में अनावश्यक रूप से परेशान किया जाता है।
बताया जाता है कि जब कोई किसान न्यायालयीन प्रकरण की नकल लेने लोक सेवा केंद्र पहुंचता है तो उसे कहा जाता है कि “नकल अभी नहीं आई, तहसील जाकर बाबू से पता कर लीजिए।” तहसील पहुंचने पर पता चलता है कि आवेदन तो बाबू के पास वहीं का वहीं पड़ा है।
आरोप है कि संबंधित बाबू कहते हैं—”फाइल निकलवानी पड़ेगी, ऐसे नहीं निकलती… कुछ खर्च करना पड़ेगा।” मजबूरी में किसान ₹200–₹300 तक देने को विवश हो जाता है। इसके बाद फोटो कॉपी के नाम पर फिर अलग से पैसे मांगे जाते हैं। जब नकल तैयार हो जाती है तो मिलान और हस्ताक्षर के नाम पर भी कथित रूप से ₹250–₹300 तक की मांग की जाती है।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब इन कर्मचारियों को सरकार हर महीने वेतन देती है तो फिर सरकारी काम करने के लिए आम किसानों से कथित रूप से अतिरिक्त “खर्च” क्यों लिया जाता है? क्या सरकारी सेवा अब रिश्वत दिए बिना संभव नहीं रह गई है?
ग्रामीणों का कहना है कि एक गरीब किसान, जो दिनभर मेहनत करने के बाद ₹200 भी नहीं कमा पाता, उसे तहसील में बैठे रसूखदार बाबुओं की कथित मांगों के आगे झुकना पड़ता है।
आज कल किसानों को एक और आफत/मुसीबत आन पड़ी है खाद के लिए जिसके लिए किसानों को जितना खाद का दाम नहीं चुकाना पड़ता उससे कही ज्यादा राजस्व विभाग में शपथ पत्र और एक फॉर्मेट में बाबू के हस्ताक्षर और सील लगाने का बाबु 300-400 रुपए तक लिया जाता है अन्यथा बिना राशि दिए किसान को तहसील का चक्कर लगाते ही दिन गुजर जाता है कही खसरा रजिस्टर्ड नहीं है कही ये कमी है तो कभी ये कागज नहीं है लेकिन जैसे ही मुंह मांगी राशि मिलती तो कोई दस्तावेज की आवश्यकता नहीं सील और सिग्नेचर होकर वेरीफिकेशन भी हो गया।
आरोप यह भी हैं कि शिकायत करने पर भी प्रभावी कार्रवाई नहीं होती और शिकायतकर्ता खुद ही परेशान हो जाता है। यदि ये आरोप सही हैं, तो यह केवल एक व्यक्ति की नहीं बल्कि पूरे प्रशासनिक तंत्र की जवाबदेही का प्रश्न है।
यदि ये आरोप सत्य हैं तो यह केवल अवैध वसूली का मामला नहीं, बल्कि गरीब किसानों के अधिकारों, न्याय व्यवस्था और शासन की विश्वसनीयता पर गंभीर प्रश्नचिह्न है।
अब आवश्यकता है कि जिला प्रशासन, संभागीय आयुक्त और राज्य सरकार इस पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कराएं। यदि किसानों से अवैध वसूली के आरोप सही पाए जाते हैं, तो दोषी कर्मचारियों एवं अधिकारियों के विरुद्ध कठोर वैधानिक कार्रवाई होनी चाहिए, ताकि आम जनता का शासन पर विश्वास बना रहे।
(यह समाचार स्थानीय नागरिकों द्वारा लगाए गए आरोपों एवं प्राप्त तथ्यों पर आधारित है। संबंधित अधिकारियों का पक्ष प्राप्त होने पर उसे भी प्रमुखता से प्रकाशित किया जाएगा।)