रायपुर। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता, पूर्व मंत्री मोहम्मद अकबर ने राज्य सरकार पर ग्रामीणों की सार्वजनिक उपयोग की भूमि को उद्योगों के लिए हस्तांतरित करने का आरोप लगाया है। उन्होंने कहा कि नकटी विवाद के बाद अब बलौदाबाजार जिले के सिमगा विकासखंड स्थित चंदेरी गांव की चरागाह भूमि को औद्योगिक उपयोग के लिए सौंपने की प्रक्रिया शुरू कर दी गई है। यह कदम सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों और मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय के सार्वजनिक आश्वासन के विपरीत है।
मोहम्मद अकबर ने बताया कि चंदेरी गांव की लगभग 23.93 हेक्टेयर यानी करीब 59 एकड़ चरागाह भूमि नए औद्योगिक क्षेत्र के विकास के लिए उद्योग विभाग को हस्तांतरित कर दी गई है। यह जमीन वर्षों से ग्रामीणों और उनके मवेशियों के उपयोग में रही है, इसलिए इसे किसी अन्य उद्देश्य के लिए देना स्थानीय हितों के खिलाफ है।
पूर्व मंत्री अकबर ने कहा कि 23 फरवरी 2024 को दामाखेड़ा में आयोजित कार्यक्रम के दौरान मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने 10 किलोमीटर के दायरे में उद्योग स्थापित नहीं होने देने का आश्वासन दिया था। अब सीएम के वादे की अनदेखी करते हुए चंदेरी की भूमि उद्योग विभाग को सौंप दी गई है। अकबर ने कहा कि राजस्व एवं आपदा प्रबंधन विभाग ने 10 मार्च 2011 को जारी आदेश में सार्वजनिक उपयोग की सुरक्षित भूमि को अन्य प्रयोजनों के लिए आवंटित नहीं करने के स्पष्ट निर्देश दिए थे। इसके बावजूद चंदेरी के खसरा नंबर 1660, 2206, 2207 और 1743 की कुल 23.93 हेक्टेयर भूमि 6 फरवरी 2026 को उद्योग विभाग के अधिकार में दे दी गई।
ग्राम पंचायत की आपत्तियों को नजरअंदाज करने का आरोप
मोहम्मद अकबर ने दावा किया है कि नायब तहसीलदार सिमगा की 19 जनवरी 2025 की आदेश पत्रिका में ग्राम पंचायत चंदेरी की आपत्ति दर्ज थी। इसके बावजूद तहसील प्रशासन ने संबंधित भूमि का आधिपत्य उद्योग केंद्र बलौदाबाजार को सौंप दिया। अकबर का कहना है कि स्थानीय निकाय की आपत्तियों को नजरअंदाज कर यह निर्णय लिया गया।
मुख्यमंत्री से की हस्तक्षेप करने की मांग
पूर्व मंत्री अकबर ने कहा कि यह मामला राजस्व मंत्री टंकराम वर्मा के गृह जिले से जुड़ा है, इसलिए उन्हें इस पूरे प्रकरण पर अपनी स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए। उन्होंने सवाल उठाया कि चरागाह और सार्वजनिक उपयोग की जमीन की सुरक्षा को लेकर सरकार की नीति क्या है। अकबर ने मुख्यमंत्री से पूरे मामले की समीक्षा कर तत्काल हस्तक्षेप करने की मांग की है। उन्होंने कहा कि यदि सार्वजनिक उपयोग की जमीन को उद्योगों के लिए आवंटित करने की प्रक्रिया नहीं रोकी गई तो इससे ग्रामीणों के अधिकारों और पारंपरिक संसाधनों पर गंभीर असर पड़ेगा।