सियासत के ‘मिस्टर कूल’ डॉ. रमन सिंह का अनकहा सफर: क्रिकेट की पिच से ‘चाउर वाले बाबा’ और अब विधानसभा अध्यक्ष तक

रायपुर। सियासत की बिसात पर अक्सर वही सूरमा इतिहास रचता है, जिसे सब्र और संयम की असली ताकत का इल्म हो। जहां उतावलापन और जल्दबाजी कई कद्दावर नेताओं के सियासी सफर पर असमय विराम लगा देते हैं, वहीं छत्तीसगढ़ की राजनीति में एक ऐसा चेहरा है, जिसने अपने असीमित धीरज और शांत स्वभाव के बल पर सत्ता के शीर्ष तक का सफर तय किया। हम बात कर रहे हैं डॉ. रमन सिंह की। एक साधारण परिवार में जन्मे और पेशे से चिकित्सक रहे डॉ. रमन सिंह ने न केवल मुख्यमंत्री के रूप में छत्तीसगढ़ की जनता के दिलों पर एक लंबे अरसे तक राज किया, बल्कि आज भी वे एक नई और गरिमामयी भूमिका निभा रहे हैं। वर्तमान में वे छत्तीसगढ़ विधानसभा के अध्यक्ष के तौर पर पूरी कुशलता और निष्पक्षता के साथ सदन का संचालन कर रहे हैं। आइए, एक आम डॉक्टर से लेकर राजनीति के अजेय योद्धा बनने तक की उनकी इस प्रेरणादायक कहानी के पन्ने पलटते हैं, जिसमें संयम, संघर्ष और सफलता के कई अनसुने और दिलचस्प किस्से दर्ज हैं।

बात 24 जनवरी 2003 की है। दोपहर के करीब 2:30 बज रहे थे। दिल्ली स्थित भाजपा मुख्यालय में पार्टी के तत्कालीन राष्ट्रीय अध्यक्ष वेंकैया नायडू अपने कक्ष में गहरी उधेड़बुन में थे। केंद्र में अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार मजबूती से चल रही थी, लेकिन नवगठित राज्य छत्तीसगढ़ में भाजपा नेतृत्वहीन थी। कांग्रेस के पास अजीत जोगी जैसा कद्दावर और चतुर नेता था, जबकि भाजपा का कुनबा बिखरा हुआ था। पार्टी के दिग्गज दिलीप सिंह जूदेव राज्य की राजनीति में आने को तैयार नहीं थे और रमेश बैस केंद्रीय मंत्री का पद छोड़ने को राजी नहीं थे। तभी वेंकैया नायडू ने अपना मोबाइल उठाया और एक नंबर डायल किया। यह नंबर था राजनांदगांव के सांसद और केंद्र सरकार में मंत्री डॉ. रमन सिंह का। नायडू ने सीधा सवाल किया- क्या आप छत्तीसगढ़ प्रदेश अध्यक्ष की जिम्मेदारी संभालेंगे? रमन सिंह के पास दिल्ली में बड़ा ओहदा, बंगला-गाड़ी सब था, लेकिन उन्होंने चुनौतियों से भरा रास्ता चुना। 29 जनवरी को वे केंद्रीय मंत्री का पद त्याग कर रायपुर लौट आए।

2003 का ऐतिहासिक जनादेश

भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष बनकर छत्तीसगढ़ लौटते ही डॉ. रमन सिंह ने पार्टी में नई ऊर्जा भर दी। पार्टी की जमीन मजबूत हो ही रही थी कि तभी दिलीप सिंह जूदेव के कथित घूसकांड ने भाजपा को बैकफुट पर ला दिया। जूदेव ने अपनी मूंछ दांव पर लगा दी थी और रमन सिंह की तकदीर भी दांव पर थी, लेकिन रमन की मेहनत ने इस दाग को धो दिया। नवंबर 2003 के पहले विधानसभा चुनाव में भाजपा ने 90 में से 50 से अधिक सीटें जीतीं। 7 दिसंबर 2003 को रायपुर के पुलिस परेड ग्राउंड में डॉ. रमन सिंह ने सूबे के पहले निर्वाचित मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली और इसके बाद तीन कार्यकालों तक अजेय रहे।

क्रिकेट का फ्रंट-फुट खिलाड़ी और हाट बाजार का शौकीन

15 अक्टूबर 1952 को कवर्धा जिले के ठाठापुर गांव में रमन सिंह का जन्म हुआ। पिता विघ्नहरण सिंह ठाकुर पेशे से वकील होने के साथ-साथ जनसंघ में भी सक्रिय थे, जबकि मां सुधा सिंह एक धार्मिक महिला थीं। तीन भाइयों और दो बहनों के बीच पले-बढ़े रमन को पिता से अनुशासन और मां से संस्कार मिले। रमन सिंह बचपन से ही वॉलीबॉल के बेहतरीन खिलाड़ी और अपनी क्रिकेट टीम के अचूक कप्तान थे। बाएं हाथ के आक्रामक बल्लेबाज रमन हमेशा फ्रंट फुट पर खेलते थे और उनकी टीम अक्सर बाहर जाकर टूर्नामेंट जीतती थी। राजनीति में विरोधियों को कब और कैसे पस्त करना है, यह रणनीति उन्होंने खेल के इसी मैदान से सीखी। उन्हें लजीज खाने का भी बेहद शौक था। वे दोस्तों के साथ हाट से सामान लाते और जमकर पार्टी करते। हालांकि बचपन में उन्हें सुबह उठना और दौड़ना बिल्कुल पसंद नहीं था, लेकिन आज वे बिना थके लगातार काम करने वाले राजनेता हैं।

स्कूली दिनों में रमन बेहद शांत और होनहार छात्र थे। वे हमेशा दूसरी या तीसरी पंक्ति में बैठते। समय पर होमवर्क करते और न कभी किसी से झगड़ते, न चुगली करते। परीक्षाओं में दोस्त उनके पास बैठने की होड़ लगाते थे, क्योंकि जो जवाब किसी को नहीं आता, वह रमन को पता होता था। पिता चाहते थे कि रमन वकील या डॉक्टर बने। छुईखदान, कवर्धा और राजनांदगांव के ग्रामीण इलाकों में डॉक्टरों की कमी और इलाज के अभाव में दम तोड़ते लोगों को देखकर रमन ने डॉक्टर बनने का फैसला किया। 1975 में उन्होंने रायपुर के आयुर्वेदिक कॉलेज से बीएएमएस की डिग्री ली। पढ़ाई के बाद उन्होंने कवर्धा में एक छोटी-सी क्लीनिक खोली। वे मरीजों का इलाज करते और कई बार दवा खरीदने के लिए अपनी जेब से पैसे भी दे देते। पूरे इलाके में एक डॉक्टर से ज्यादा समाजसेवी के रूप में उनकी पहचान बन गई।

राजनीति में एंट्री

राजनीति से दूर भागने वाले रमन सिंह की किस्मत ने 1976 में पलटी मारी। उनके घर पर जनसंघ की बैठक चल रही थी, जिसमें कवर्धा जिलाध्यक्ष के लिए उनका नाम प्रस्तावित हुआ। पहले उन्होंने मना किया, लेकिन फिर जिम्मेदारी स्वीकार कर ली। इसी दौरान अटल बिहारी वाजपेयी ने उन्हें साइकिल यात्रा का जिम्मा सौंपा। तैयारी के लिए सिर्फ 2-3 दिन थे, लेकिन रमन ने हजारों युवाओं के साथ एक बेहद सफल यात्रा निकाली, जिसने उन्हें पार्टी के शीर्ष नेताओं की नजरों में ला दिया।

सरकारी बस में निकली थी बारात

अपने पेशे में रमन इतने रम गए कि वो भूल ही गए थे उन्हें जल्द ही नई जिम्मेदारी भी संभालनी होगी। मां के लाड़ले रमन के सामने वैसे तो शादी के कई प्रस्ताव आए, लेकिन उन्होंने हामी भरी वीणा सिंह को देखकर। साल 1980-81 में रमन सिंह वीणा सिंह को दुल्हन बनाने को राजी हो गए। रमन को बारात लेकर शहडोल के बुढ़वा गांव जाना था। बारातियों के लिए एक बस की व्यवस्था की गई थी। जिस रमन के आगे-पीछे आज दर्जनों गाड़ियां चलती हैं, वो रमन दूल्हा बनकर घोड़ी पर नहीं बल्कि बस पर सवार होकर अपने ससुराल पहुंचे और बस भी थी राज्य परिवहन निगम की। शादी के बाद की जिम्मेदारी के बावजूद रमन का स्वभाव नहीं बदला, बल्कि उनके स्वभाव को सहयोग और साथ मिला वीणा सिंह का। परिवार की नई जिम्मेदारी के बीच रमन सिंह और भी निखर कर सामने आए। शादी के कुछ दिनों बाद ही रमन सिंह को राजनीति में पहला मुकाम मिल गया। साल 1983-84 में वे कवर्धा नगरपालिका के शीतला वार्ड से पार्षद चुने गए। कांग्रेस के मजबूत गढ़ वाले नगरीय निकाय क्षेत्र में बीजेपी से उस वक्त सिर्फ दो ही पार्षद बीजेपी से थे, जिसमें एक नाम रमन सिंह का था। पार्षद बनकर एक तरफ रमन की राजनीतिक सक्रियता बढ़ी, तो दूसरी तरफ रमन सिंह का दायरा और लोकप्रियता भी बढ़ी। इसी बीच रमन दो बच्चों के पिता बन गए। बिटिया अस्मिता और बेटा अभिषेक। 1990 में रमन सिंह ने अपना पहला विधानसभा चुनाव लड़ा और अपने पहले ही चुनाव में उन्होंने कांग्रेस के जगदीश चंद्रवंशी पर शानदार जीत दर्ज की। उसके बाद 1993 में राम राज्य परिषद की रानी शशिप्रभा के खिलाफ जीत दर्ज की, लेकिन उसके बाद 1998 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के योगेश्वर राज से हार गए। सबको लगा शायद रमन सिंह की कामयाबी का सफर थम गया, लेकिन इस हार ने रमन की सियासत की पूरी नियति बदल दी। अटल बिहारी के चहेते रमन को मोतीलाल वोरा जैसे दिग्गज के खिलाफ 1999 के आम चुनाव में राजनांदगांव से चुनाव मैदान में उतारा गया। सबने बोला वोरा की आंधी में रमन तिनके की तरह उड़ जाएंगे। वैसे भी मोतीलाल वोरा की गिनती उस वक्त कांग्रेस के सबसे बड़े सियासी दिग्गज के रूप में होती थी, लेकिन रमन ने हर राजनीतिक विश्लेषक की राय को गलत साबित कर कांग्रेसी दिग्गजों के गणित को बिगाड़ दिया। अपनी सबसे बड़ी अग्नि परीक्षा में रमन ने मोतीलाल वोरा को बड़े अंतर से हराकर सियासत की दुनिया में सुर्खियां बटोर लीं। इस जीत का इनाम भी रमन सिंह को मिला और अटल बिहारी वाजपेयी की कैबिनेट में 13 अक्टूबर 1999 को उन्हें मंत्री पद की शपथ दिलाई गई।

चुनौतियों का चक्रव्यूह

कभी दिल जीत लेने वाली मुस्कुराहट, तो कभी गहरी सोच वाली गंभीरता। कभी हार नहीं मानने का जज्बा तो कभी दावे को दमदारी से निभाने का दम। रमन सिंह के चेहरे के पीछे की ये वो परछाई है, जिसने उन्हें सियासत की हर चुनौती में निखारा। रमन सिंह को करीब से देखने वाले उन्हें कई नजरों से देखते हैं और जानने वाले कई अंदाज में पहचानते हैं, लेकिन हर नजर और हर अंदाज उनकी मजबूती और संजीदगी के साथ-साथ सियासत के सबसे बड़े सूरमा के रूप में ही पहचान बताती और दिखाती है। ऐसा नहीं था कि विपक्ष ने उनके दामन पर कीचड़ नहीं उछाले। कई बार रमन सिंह सियासी चक्रव्यूह में उलझे, लेकिन हर बार वो बेदाग सामने आए। बतौर मुख्यमंत्री तीन कार्यकाल में रमन को जनता से खूब दुलार मिला। छत्तीसगढ़ के बदले चेहरे को जिसने भी देखा वो रमन का गुणगान करता दिखा। प्रदेश की शानदार खाद्य योजना की मुरीद तो तब केंद्र की मनमोहन सरकार भी थी और सुप्रीम कोर्ट ने भी रमन की पीठ थपथपाई थी। आज छत्तीसगढ़ के पास कामयाबी की कई किताबें हैं और रमन सिंह के हाथों में करिश्माई कारनामों से भरे ढेर सारे पुरस्कार। आज रमन सिंह विधानसभा अध्यक्ष की नई भूमिका में हैं, लेकिन उनकी खूबी उन्हें विशेष बनाती है। मुश्किल से मुश्किल हालातों में मुस्कुराना, कभी आपा न खोना और बिना निराश हुए हर चुनौती को पार करना ही डॉ. रमन सिंह को छत्तीसगढ़ की सियासत का वो सिकंदर बनाता है, जिसका सम्मान उनके विरोधी भी करते हैं।