जिले में जल, जंगल, जमीन पर खतरा मंडरा रहा ,रिजर्व फॉरेस्ट 43 को गांव के पंच सरपंच से मिलीभगत उसका सौदा कर क्रेसर संचालक के बड़े वाहनों चलाने के लिए बना दी सड़क

सक्ती। जिले में जल, जंगल, जमीन पर खतरा मंडरा रहा है। जिले में कुछ ही क्षेत्र वन भूमि और जंगल शेष बचे हैं, जिसे भी अब उद्योगपति अपने फायदे के लिए नष्ट करते जा रहे हैं। यहां तक की रिजर्व फॉरेस्ट भी इनसे सुरक्षित नहीं रहा। मामला जिले के छीता पंडरिया गांव का है, जहां रिजर्व फॉरेस्ट 43 को गांव के पंच सरपंच से मिलीभगत कर उसका सौदा कर दिया गया और वहां क्रेसर संचालक के बड़े वाहनों चलाने के लिए सड़क बना दी। पूरे षडयंत्र में गांव के जनप्रतिनिधि से लेकर वन विभाग के अधिकारियों की भी संलिप्ता सामने आ रही है, जो सब कुछ जानकार भी अनजान बैठे हैं।

दरअसल सक्ती जिले के छीता पंडरिया गांव में मे. गुरुश्री मिनरल्स के कई डोलोमाइट खदान है, जहां से पत्थर लाने ले जाने के लिए अवैध तरीके से रिजर्व फॉरेस्ट जंगल की कटाई कर दी गई और सड़क बना दिया। यहां तक की वहां से गुजरने वाली नदी पर पुल बना दिया। मामला जब गरमाने लगा तो गांव के सरपंच और वन विभाग से मिलकर एक बड़ा षड्यंत्र रचा गया। गांव के सरपंच ने रिजर्व फॉरेस्ट में ग्रामीणों के आने जाने के लिए रास्ता कच्ची सड़क बनाने वन विभाग से अनुमति मांगी और अनुमति मिलते ही सड़क को गुरुश्री मिनरल्स को सौंप दिया।

सूचना के अधिकार से मिले दस्तावेज से सारे षड्यंत्र का खुलासा हुआ की कैसे रिजर्व फॉरेस्ट की जमीन का सरपंच और वनविभाग के अधिकारियों ने मिलकर उसे क्रेसर संचालक को सौंप दिया। केवल 10 दिनों में पंचायत का प्रस्ताव से लेकर वन विभाग से अनुमति की प्रक्रिया पूरी हो जाती है और अनुमति मिलते ही उसी दिन सरपंच पत्र लिखकर उस रास्ते को गुरूश्री मिनरल्स की गाड़ियों के उपयोग के लिए वन विभाग से अनुमति मांगता है।

रिजर्व फॉरेस्ट में जहां आम आदमी के जाने पर भी प्रतिबंध होता है उसे षडयंत्र कर एक उद्योगपति को सौंप दिया जाता है। मामले में जब वन विभाग के अधिकारियों से जानकारी मांगी जाती है तो कुछ भी कहने से साफ मना कर देते हैं। वही मामले में सक्ती कलेक्टर ने संज्ञान लेकर टीम गठित कर जांच की बात कही है।

सक्ती के कलेक्टर अमृत विकास तोपनो ने कहा​ कि लोगों से शिकायत मिली है। जनप्रतिनिधियों ने बिना अनु​मति के रिजर्व फारेस्ट से सड़क बनवाई है। इसी के लिए जांच समिति ​गठित की जाएगी, जो तथ्यों का जांच करेगी।

मामले में कई शिकायत भी हुई मगर उद्योगपति की पहुंच और पैसे की चमक ने जिम्मेदारों की आंखे बंद कर दी है। वन्य जीवों के लिए आरक्षित जंगल और नदियों पर भी ये उद्योगपति अपनी मनमानी कर रहे हैं। ऐसे में यह कहना गलत नहीं होगा की भविष्य में जल, जंगल, जमीन केवल किताबों में ही देखने और पढ़ने को मिलेगी।

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