हसदेव अरण्य में खनन का बढ़ता दायरा : जंगल, गांव और आजीविका पर गहराता असर

अंबिकापुर/सरगुजा। हसदेव अरण्य क्षेत्र में कोयला खनन परियोजनाओं का विस्तार लगातार चर्चा का विषय बना हुआ है। उपलब्ध सरकारी जानकारी और सार्वजनिक रिपोर्टों के अनुसार, क्षेत्र में खनन के चलते बड़े पैमाने पर वन क्षेत्र प्रभावित हुआ है, जबकि कई गांवों के लोगों के विस्थापन और आजीविका पर भी असर पड़ा है।

सांकेतिक मानचित्र के अनुसार, हसदेव अरण्य में तीन प्रमुख कोयला ब्लॉक—PEKB (Parsa East & Kente Basan), पारसा और केंटे एक्सटेंशन—मुख्य रूप से प्रभावित क्षेत्र हैं। इनमें PEKB परियोजना में खनन पहले से जारी है, जबकि केंटे एक्सटेंशन को विस्तार के रूप में देखा जा रहा है।

केंद्र सरकार द्वारा संसद में दी गई जानकारी के अनुसार, PEKB परियोजना में अब तक लगभग 94,460 पेड़ों की कटाई की जा चुकी है। वहीं, स्वीकृत योजनाओं के अनुसार लगभग 2,73,757 अतिरिक्त पेड़ों की कटाई का प्रावधान है। यदि ये सभी स्वीकृत कटान पूरी होती है, तो कुल संख्या लगभग 3.68 लाख पेड़ों तक पहुंच सकती है।

मानचित्र में केते गांव को विस्थापित गांव के रूप में दर्शाया गया है। विभिन्न सार्वजनिक रिपोर्टों के अनुसार, यहां के करीब 200 परिवार पुनर्वास से प्रभावित हुए हैं। इसके अलावा पारसा और केंटे एक्सटेंशन परियोजनाओं से जुड़े कई अन्य गांवों के लोगों पर भी प्रभाव पड़ने की आशंका या दावा किया गया है।

हसदेव अरण्य केवल घना वन क्षेत्र ही नहीं, बल्कि हाथी कॉरिडोर और अनेक वन्यजीवों का महत्वपूर्ण आवास भी है। पर्यावरण विशेषज्ञों का कहना है कि बड़े पैमाने पर वन कटाई से जैव विविधता, जल स्रोतों और स्थानीय पारिस्थितिकी पर दीर्घकालिक प्रभाव पड़ सकता है। दूसरी ओर, सरकार का पक्ष है कि कोयला परियोजनाएं ऊर्जा सुरक्षा, रोजगार और आर्थिक विकास के लिए महत्वपूर्ण हैं तथा इनके साथ पुनर्वनीकरण और पुनर्वास जैसी वैधानिक प्रक्रियाएं अपनाई जाती हैं।

हसदेव अरण्य को लेकर स्थानीय ग्रामीणों, पर्यावरण संगठनों, उद्योग और सरकार के बीच लंबे समय से अलग-अलग मत रहे हैं। यह मुद्दा विकास, पर्यावरण संरक्षण और स्थानीय समुदायों के अधिकारों के बीच संतुलन का महत्वपूर्ण उदाहरण बन गया है।

नोट : समाचार में प्रयुक्त आंकड़े संसद में दी गई सरकारी जानकारी तथा सार्वजनिक रूप से उपलब्ध रिपोर्टों पर आधारित।