रायपुर/अंबिकापुर। छत्तीसगढ़ के आर्थिक हालात को लेकर इन दिनों एक सवाल तेजी से चर्चा में है—क्या राज्य दिवालिया होने की कगार पर पहुंच गया है? इस सवाल के पीछे नीति आयोग की मार्च 2025 में जारी “A Macro and Fiscal Landscape of the State of Chhattisgarh” रिपोर्ट का हवाला दिया जा रहा है। रिपोर्ट में राज्य के कर्ज और भविष्य की ऋण-स्थिरता को लेकर गंभीर चिंता जरूर जताई गई है, लेकिन यह कहना कि “नीति आयोग ने छत्तीसगढ़ को दिवालिया घोषित कर दिया है” या “राज्य जल्द दिवालिया होने वाला है”, रिपोर्ट की भाषा और आंकड़ों का सही अर्थ नहीं है।
दरअसल, नीति आयोग की रिपोर्ट एक Debt Sustainability Assessment यानी ऋण स्थिरता आकलन करती है। इसमें अलग-अलग परिस्थितियों में यह अनुमान लगाया गया है कि राज्य का कर्ज उसके सकल राज्य घरेलू उत्पाद यानी GSDP के मुकाबले किस दिशा में जा सकता है। रिपोर्ट का निष्कर्ष यह है कि मौजूदा रुझानों को लंबे समय तक बनाए रखने पर ऋण-GSDP अनुपात में अपेक्षित गिरावट नहीं आती और कुछ परिस्थितियों में यह बढ़ सकता है।
2022-23 में तस्वीर इतनी खराब भी नहीं थी
नीति आयोग के आंकड़ों के अनुसार 2022-23 में छत्तीसगढ़ का सार्वजनिक ऋण GSDP का लगभग 24 प्रतिशत था। यह उस समय बड़े राज्यों के मध्य स्तर से कम था। राज्य का राजकोषीय घाटा यानी Fiscal Deficit GSDP का 3.2 प्रतिशत और प्राथमिक घाटा 1.6 प्रतिशत था। खास बात यह थी कि 2022-23 में राज्य को 0.6 प्रतिशत का Revenue Surplus था, जबकि तुलना में मध्य राज्य Revenue Deficit में था।
राज्य की कुल राजस्व प्राप्तियां भी GSDP के 21.4 प्रतिशत के बराबर थीं, जो मध्य राज्य से करीब 1.5 प्रतिशत अंक अधिक थीं। इसका मतलब यह है कि नीति आयोग की रिपोर्ट में छत्तीसगढ़ को तत्काल आर्थिक रूप से टूट चुका राज्य नहीं बताया गया था। बल्कि रिपोर्ट में उसकी कुछ वित्तीय ताकतों को भी दर्ज किया गया है।
असली चिंता कहां है?
नीति आयोग की चिंता भविष्य के ऋण को लेकर है। रिपोर्ट में अलग-अलग परिस्थितियों में Debt Sustainability Assessment किया गया। आधारभूत परिदृश्य में 2012-13 से 2021-22 के दस वर्षों के औसत आर्थिक विकास, प्राथमिक घाटे और ब्याज दर जैसे आंकड़ों को आधार बनाया गया। इस स्थिति में अगले पांच वर्षों में Debt-to-GSDP ratio में करीब 5 प्रतिशत अंक की बढ़ोतरी का अनुमान लगाया गया।
रिपोर्ट में चार प्रमुख परिदृश्य दिखाए गए। आधारभूत स्थिति में ऋण अनुपात लगभग 30.5 प्रतिशत, अधिक आर्थिक विकास की स्थिति में करीब 27.9 प्रतिशत, प्राथमिक घाटा कम होने पर करीब 25.2 प्रतिशत, जबकि contingent liabilities का दबाव बढ़ने वाले खराब परिदृश्य में यह लगभग 35 प्रतिशत तक पहुंचने का अनुमान लगाया गया।
यही वह हिस्सा है जिसे सोशल मीडिया में कई बार “छत्तीसगढ़ दिवालिया होने वाला है” के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है। जबकि रिपोर्ट वास्तव में भविष्य के ऋण जोखिम की चेतावनी देती है, दिवालिया होने की घोषणा नहीं करती।
CAG की ताजा रिपोर्ट से क्या पता चलता है?
नीति आयोग की रिपोर्ट के बाद अब छत्तीसगढ़ की वित्तीय स्थिति का मूल्यांकन करते समय नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक यानी CAG की 2024-25 की State Finances Audit Report भी महत्वपूर्ण है। यह रिपोर्ट 14 जुलाई 2026 को राज्य विधानसभा में पेश की गई। CAG ने इसमें राज्य की वित्तीय स्थिति, घाटे, कर्ज, बजट प्रबंधन और वित्तीय रिपोर्टिंग का विश्लेषण किया है।
इस रिपोर्ट का महत्व इसलिए भी अधिक है क्योंकि यह 2024-25 के वास्तविक वित्तीय वर्ष की स्थिति का ऑडिट विश्लेषण करती है, जबकि नीति आयोग की मूल रिपोर्ट में उपलब्ध प्रमुख वित्तीय आंकड़े मुख्यतः 2022-23 तक के थे। इसलिए आज की स्थिति समझने के लिए नीति आयोग के पुराने आकलन के साथ CAG और नए बजट के आंकड़ों को भी देखना जरूरी है।
2026-27 के बजट में सरकार की क्या स्थिति?
छत्तीसगढ़ सरकार ने 24 फरवरी 2026 को 2026-27 का बजट पेश किया। सरकार ने GSDP को लगभग 7.10 लाख करोड़ रुपये अनुमानित किया है। बजट में कुल व्यय, ऋण अदायगी को छोड़कर, करीब 1.72 लाख करोड़ रुपये रखा गया है। राज्य को 2026-27 में लगभग 1.43 लाख करोड़ रुपये की गैर-उधारी प्राप्तियां होने का अनुमान है। साथ ही करीब 12,300 करोड़ रुपये का कर्ज चुकाने का प्रावधान है।
लेकिन यहां एक महत्वपूर्ण आंकड़ा सामने आता है। PRS के बजट विश्लेषण के अनुसार 2026-27 में छत्तीसगढ़ का Revenue Deficit करीब 2,000 करोड़ रुपये यानी GSDP का 0.3 प्रतिशत अनुमानित है। वहीं Fiscal Deficit सरकार के आंकड़ों की एक गणना में 20,400 करोड़ रुपये बताया गया है, लेकिन PRS द्वारा सार्वजनिक खाते की प्राप्तियों को अलग तरीके से गणना में शामिल करने पर Fiscal Deficit 28,900 करोड़ रुपये यानी GSDP का 4.1 प्रतिशत आता है।
यह अंतर इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि Fiscal Deficit की गणना में अलग-अलग लेखांकन दृष्टिकोण अपनाए जाने से आंकड़ा बदल सकता है। PRS ने स्पष्ट किया है कि राज्य सरकार ने Fiscal Deficit निकालते समय Public Account Receipts को non-debt capital receipts के रूप में शामिल किया है, जिससे उसका आंकड़ा कम दिखाई देता है।
कर्ज का बोझ कितना है?
PRS के अनुसार छत्तीसगढ़ की outstanding liabilities यानी बकाया देनदारियां 2011-12 में GSDP की करीब 11.5 प्रतिशत थीं। 2023-24 में यह बढ़कर 24.7 प्रतिशत हो गईं। 2026-27 के अंत तक इन्हें करीब 21.4 प्रतिशत रहने का अनुमान लगाया गया है।
इसका अर्थ है कि पिछले डेढ़ दशक में राज्य के कर्ज का बोझ अर्थव्यवस्था की तुलना में काफी बढ़ा है। हालांकि भविष्य के बजट अनुमान में इसे कुछ कम स्तर पर रखने का प्रयास दिखाई देता है। इसलिए केवल कर्ज बढ़ने को देखकर “दिवालिया” कहना उचित नहीं होगा, लेकिन ऋण की दिशा निश्चित रूप से चिंता का विषय है।
ऑफ-बजट कर्ज भी बड़ी चिंता
राज्य की वित्तीय स्थिति का एक महत्वपूर्ण पहलू Off-budget Borrowings है। ये ऐसे कर्ज होते हैं जो सीधे राज्य सरकार के नाम से नहीं लिए जाते, लेकिन जिनके मूलधन या ब्याज का भुगतान अंततः सरकारी बजट से किया जाता है।
PRS के अनुसार CAG के आंकड़ों के आधार पर मार्च 2024 में छत्तीसगढ़ की Off-budget Borrowings करीब 7,293 करोड़ रुपये थीं। 2017-18 से 2023-24 के बीच राज्य ने इन कर्जों के मूलधन के रूप में करीब 1,634 करोड़ रुपये चुकाए। इसके अलावा ब्याज का भुगतान भी हुआ और 2023-24 में इस पर ब्याज करीब 742 करोड़ रुपये रहा।
यह व्यवस्था लंबे समय तक जारी रहने पर वित्तीय पारदर्शिता और ऋण प्रबंधन के लिहाज से चुनौती बन सकती है। 16वें वित्त आयोग ने भी Off-budget Borrowings की व्यवस्था समाप्त कर सभी ऐसे कर्जों को बजट में शामिल करने की सिफारिश की है।
सरकार की गारंटी भी जोखिम
राज्य का पूरा वित्तीय जोखिम केवल उसके सीधे कर्ज से नहीं समझा जा सकता। सरकार विभिन्न सार्वजनिक उपक्रमों और संस्थाओं को ऋण लेने के लिए गारंटी भी देती है। यदि संबंधित संस्था अपना कर्ज चुकाने में असफल रहती है तो कुछ परिस्थितियों में सरकार पर यह बोझ आ सकता है।
PRS के अनुसार जनवरी 2026 में छत्तीसगढ़ की outstanding government guarantees करीब 17,888 करोड़ रुपये थीं। यह मार्च 2025 के करीब 20,763 करोड़ रुपये के मुकाबले 14 प्रतिशत कम है। फिर भी यह राज्य के लिए एक महत्वपूर्ण contingent liability है।
खर्च का बढ़ता दबाव
राज्य की वित्तीय चुनौती का एक कारण खर्च का स्वरूप भी है। 2023-24 में छत्तीसगढ़ ने subsidies और transfers पर GSDP का करीब 8.1 प्रतिशत, यानी लगभग 41,607 करोड़ रुपये खर्च किए। PRS के मुताबिक यह सभी राज्यों के औसत 2.6 प्रतिशत से काफी अधिक था। 2018-19 से 2023-24 के बीच इस प्रकार के खर्च में लगभग 18 प्रतिशत की वार्षिक दर से वृद्धि हुई।
2026-27 में राज्य ने कृषि, महतारी वंदन और बिजली सब्सिडी जैसी मदों पर अपनी राजस्व प्राप्तियों का लगभग 17 प्रतिशत खर्च करने का अनुमान लगाया है। दूसरी तरफ वेतन, पेंशन और ब्याज जैसे committed expenditure पर करीब 57,293 करोड़ रुपये, यानी अनुमानित राजस्व प्राप्तियों का लगभग 40 प्रतिशत खर्च होने का अनुमान है।
यही वह स्थिति है जहां सरकार के लिए विकास कार्यों और सामाजिक योजनाओं के बीच वित्तीय संतुलन बनाए रखना चुनौतीपूर्ण हो जाता है।
फिर क्या छत्तीसगढ़ दिवालिया हो रहा है?
उपलब्ध दस्तावेजों के आधार पर ऐसा कहना सही नहीं होगा।
दिवालिया होने का दावा करने के लिए यह दिखाना होगा कि राज्य अपने अनिवार्य वित्तीय दायित्वों का भुगतान करने की स्थिति में नहीं है। उपलब्ध बजट दस्तावेज यह नहीं दिखाते कि छत्तीसगढ़ ऐसी स्थिति में पहुंच चुका है। राज्य अभी भी राजस्व जुटा रहा है, कर्ज ले रहा है, पुराने कर्ज का भुगतान कर रहा है और विकास योजनाओं पर खर्च कर रहा है।
2026-27 में राज्य ने करीब 12,300 करोड़ रुपये ऋण पुनर्भुगतान के लिए भी रखा है। इसका अर्थ है कि सरकार की वित्तीय गतिविधियां जारी हैं और तत्काल भुगतान-असमर्थता जैसी स्थिति सामने नहीं है।
लेकिन इसका दूसरा पहलू भी उतना ही महत्वपूर्ण है। 2025-26 में संशोधित अनुमान के अनुसार Fiscal Deficit 4.2 प्रतिशत GSDP और Revenue Deficit 1.6 प्रतिशत GSDP तक पहुंचने का अनुमान था। 2026-27 में भी Revenue Deficit का अनुमान है। यानी सरकार के सामने वित्तीय अनुशासन बनाए रखने की चुनौती बनी हुई है।
आगे क्या करना होगा?
छत्तीसगढ़ की वित्तीय स्थिति को मजबूत रखने के लिए तीन मोर्चे सबसे महत्वपूर्ण दिखाई देते हैं।
पहला, राजस्व बढ़ाना और कर संग्रह मजबूत करना। 2026-27 में राज्य ने अपने कर राजस्व में वृद्धि का लक्ष्य रखा है। State GST से करीब 17,780 करोड़ रुपये प्राप्त होने का अनुमान है। खनन से करीब 19,000 करोड़ रुपये गैर-कर राजस्व का लक्ष्य रखा गया है।
दूसरा, कर्ज का बेहतर प्रबंधन। Off-budget borrowing और contingent liabilities को नियंत्रित करना आवश्यक होगा।
तीसरा, राजस्व खर्च और विकास खर्च में संतुलन। ऐसी योजनाएं जो तत्काल राजनीतिक या सामाजिक लाभ देती हैं, उनके साथ-साथ सड़क, सिंचाई, शिक्षा, स्वास्थ्य और औद्योगिक ढांचे जैसे क्षेत्रों में निवेश बढ़ाना जरूरी है, क्योंकि पूंजीगत खर्च भविष्य में आर्थिक गतिविधि और राजस्व दोनों को बढ़ा सकता है।
निष्कर्ष
नीति आयोग की रिपोर्ट को अगर पूरी तरह पढ़ा जाए तो उसका संदेश सनसनीखेज “दिवालिया होने” का नहीं, बल्कि सावधान करने वाला है। रिपोर्ट ने बताया था कि 2022-23 में छत्तीसगढ़ का Debt-to-GSDP ratio करीब 24 प्रतिशत था और यह कई राज्यों की तुलना में कम था। लेकिन Debt Sustainability Assessment ने यह भी चेतावनी दी कि मौजूदा आर्थिक और वित्तीय परिस्थितियां बनी रहीं तो आने वाले वर्षों में ऋण अनुपात में उल्लेखनीय कमी नहीं आएगी।
आज, 2026 में उपलब्ध नए आंकड़े तस्वीर को और व्यापक बनाते हैं। एक ओर राज्य की अर्थव्यवस्था बढ़ रही है, राजस्व जुटाने की क्षमता मौजूद है और 2026-27 के बजट में बड़े पूंजीगत खर्च का प्रावधान किया गया है। दूसरी ओर राजस्व घाटा, Fiscal Deficit, outstanding liabilities, Off-budget Borrowings और government guarantees जैसे मुद्दे वित्तीय अनुशासन की मांग करते हैं।
इसलिए सबसे सटीक निष्कर्ष यही है कि छत्तीसगढ़ दिवालिया नहीं हुआ है और नीति आयोग ने भी ऐसा नहीं कहा है। लेकिन राज्य के बढ़ते वित्तीय दायित्वों को नजरअंदाज करना भी गंभीर भूल होगी। यदि आने वाले वर्षों में राजस्व वृद्धि आर्थिक विकास की गति के साथ बनी रहती है और सरकार कर्ज, सब्सिडी तथा गैर-उत्पादक खर्च को नियंत्रित करती है, तो स्थिति संभाली जा सकती है। इसके विपरीत यदि लगातार बढ़ते खर्च को पूरा करने के लिए कर्ज पर निर्भरता बढ़ती गई, तो भविष्य में ऋण स्थिरता का संकट गहरा सकता है।
यानी आज की खबर “छत्तीसगढ़ दिवालिया होने वाला है” नहीं, बल्कि “छत्तीसगढ़ को अपनी वित्तीय सेहत सुधारने के लिए अभी से सावधान रहने की जरूरत है” है। यही नीति आयोग, CAG और नए बजट के आंकड़ों को साथ रखकर निकलने वाला अधिक तथ्यात्मक निष्कर्ष है।